समाजसेवी प्रदीप सारंग को जन्म दिन मुबारक

बाराबंकी (हरी प्रसाद वर्मा) कला, साहित्य, समाजसेवा, पर्यावरण, परिन्दा संरक्षण जैसे सामाजिक सरोकार के विभन्न कार्यक्रमों के गलियारों में लगभग एक दशक से अहम किरदार निभाने वाले अनुज *प्रदीप सारंग* को उनके 48वें जन्म दिन पर कोटि कोटि बधाई।

भाई प्रदीप सारंग आज अपनी लगन, निष्ठा और किसी कार्य को बाखूबी अंजाम देने के लिए जाने-पहचाने जाते हैं । आँखें-इण्डिया मुहिम ने उनके किरदार में चार चाँद लगा दिए हैं। परिन्दा संरक्षण अभियान , पर्यावरण संरक्षण मुहिम , पुराने गर्म कपड़ों का संग्रह एवं जरूरत मन्दों में वस्त्र वितरण जैसे कार्यक्रमों को लेकर समाजसेवा के क्षेत्र में आज एक अलग मुकाम हासिल किया है । शिक्षा-स्नातक की उपाधि से विभूषित श्री सारंग की हिन्दी भाषा विज्ञान में विशेष अभिरुचि है, जिसके चलते साहित्य एवं लेखन के क्षेत्र में भी उनकी अपनी अलग पहचान है।

आजकल श्री सारंग अपने जनपद सहित कई अन्य जनपदों में जाकर महाविद्यालयों और इन्टर कालेजो में मोटिवेशनल कक्षाओं के माध्यम से छात्रों के बीच समय-प्रबंधन, पढ़ाई की वैज्ञानिक पद्धति, अधिक अंक पाने के तरीके, मनुष्य की आदतें उसके लक्ष्य में बाधक, आदि विषयों पर वार्ता कर युवाओं और छात्रों को प्रेरित करने का काम कर रहे है।वही जीरो लागत खेती को प्रोत्साहित करने को लेकर किसानों के बीच काफी सक्रिय है, मै आप मित्रों कीओर से ऊर्जावान,उत्साही , समाजसेवी साथी भाई प्रदीप सारंग जी को उनके 48वें जन्मदिन पर मुबारक देते हुए आशा करता हूँ कि श्री सारंग जी आप लोगों के आशीर्वाद से सामाजिक सरोकार के कार्यो को बखूबी अंजाम देने में सार्थक सिद्ध होंगे ऐसा मेरा विश्वास है।

Court Order regarding Shrawan Kumar Sahu murder case

CASE: Murder of Ayush Sahu on 16.10.2013.
Accused as per FIR, Akeel Ansari.
Father Shrawan Kumar Sahu who was the eye witness of the case and was fighting for the justice for his son with a demand of security for him and his family which was not provided. On not giving up on the case of his son’s murder, Shrawan Kumar Sahu was shot dead by the people of the accused party. He succumbed to his injuries on 1.2.2017.
It was because of the background of Ayush Sahu and Shrawan Kumar Sahu’s murder, four policemen including Mr. Shishu Pal Singh, the Reserve Inspector, were suspended.
Smt. Nirmala Sahu had filed a writ petition seeking mandamus for transfer of investigation of the case to the C.B.I. It also prays that she and her family are given adequate protection, which is being given round the clock to them, as per the court’s orders of 20.03.2017.
Allegations have been made against the police that instead of providing protection to the deceased and his family members had been hobnobbing with the criminals accused in the incident.
“The issue of transferring the case to the C.B.I., does not appear to be in dispute any longer inasmuch as the manner in which the deceased lost his life and the manner in which he was not provided adequate security inspite of request in this regard brings their case within the rare exceptional cases in order to instill confidence in the mind of public at large that the case deserves to be transferred to the C.B.I. for a free, fair and honest investigation of the commission of the crime and further to ensure an impartial investigation of the case”, ordered the Court on 20.03.2017
The Court continues,”Consequently, for all the reasons, we direct the Director, C.B.I. Lucknow herein to forthwith proceed to issue necessary orders for taking over the investigation of the case and further the State Government and it’s agencies including concerned Police Officials shall be obliged to hand over all such documents that may be required for the purpose of continuing the investigation by the C.B.I.”
The concerned Reserve Inspector , Mr. Shishu Pal Singh, who was suspended has been reinstated on the same post.
The matter shall come up on 4.4.2017.

क्या महिलाओं का सम्मान सुरक्षित है

महिला दिवस पर विशेष

महिला सशक्तिकरण पर तमाम लेख प्रकाशित होते रहते हैं, पर वास्तव में देखा जाए तो भारतवर्ष में महिलाओं ने हर क्षेत्र में जिस तरीके से अपनी भागीदारी सुनिश्चित करी है उससे महिला सशक्तिकरण के गौरवान्वित करने वाले ठोस परिणाम भी मिलते हैै।
अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिए महिलाओं को अधिकार देना ही महिला
समाज में सभी क्षेत्रों में पुरुष और महिला दोनों को बराबरी में लाने का प्रयास हर क्षेत्र में किया जा रहा है। देश को पूरी तरह से विकसित बनाने तथा विकास के महान लक्ष्य को पाने के लिए एक जरूरी हथियार के रूप में है महिला सशक्तिकरण। भारतीय संविधान के प्रावधान के अनुसार पुरुषों की तरह सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबर अधिकार देने के लिए कानूनी स्थिति भी समर्थन करती है। विकास की मुख्यधारा में महिलाओं को लाने के लिए भारतीय सरकार के द्वारा कई योजनाओं को निरूपित किया गया है। पूरे देश की जनसंख्या में महिलाओं की भागीदारी आधे की है और महिलाओं और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए हर क्षेत्र में इन्हें स्वतंत्रता की जरूरत है। नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न यह उठता है कि क्या महिलाएं सचमुच मजबूत बन चुकी हैं, क्या उनके लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है, क्या वे लंबे लंबे घूंघट से बाहर आ चुकी हैं, लगता है कि सब कुछ हो गया है, लेकिन आज भी गौर से नहीं, मोटे तौर पर देखा जाए नारी के सम्मान की रक्षा इस देश में सुनिश्चित नहीं है, विशेषकर उत्तर प्रदेश और इससे सटे हुए प्रदेशों में अनेको अनेक घटनाएं हैं चाहे वह राजधानी दिल्ली का निर्भया कांड रहा हो,चाहे वो लखनऊ का गौरी हत्याकांड या बुलंदशहर हाईवे की घटना या बदायूं की घटना व ऐसी अन्य घटनाएं जो कि प्रदेशों से जुडी हुयी हैं, कुछ नेता और मंत्रियों द्वारा की गई बर्बरतापूर्ण शोषण कथाएं आज भी महिला के असुरक्षित होने के पर्याप्त संकेत प्रदर्शित करती हैं।
हम कहां तक सफल हैं नारी सम्मान की रक्षा में?
नारी हमारी नजर में क्या है यह एक अलग विषय है, नारी की नजर में पुरुष क्या है, यह एक अहम विषय है। एक मध्यमवर्गीय नारी की पीड़ा उस वक्त नजर आती है जब वह अपने ही शहर की सड़कों और गलियों में दिन में निकलने में डरने लगी है, विशेषकर जब वह अकेली हो या उसकी बेटी साथ में हो वह लगातार अपने आप को असुरक्षित महसूस करके भयभीत रहती है । यह हमारे लिए चिंतन का विषय ही नहीं है अपितु शर्म का विषय है। एक दिन महिला दिवस मना कर मानो हम पूरी नारी जाति पर एहसान कर रहे हैं।
इसमें कोई शक नहीं है कि आज शासन-प्रशासन राजनीति खेलकूद और कई जगह इस आधी आबादी में अपना एक अलग स्थान बनाया है संपूर्ण नारी जगत को गर्व की अनुभूति कराई है, लेकिन उस का प्रतिशत कितना है शायद शोषित वर्ग का प्रतिशत सफल महिलाओं के प्रतिशत का कई गुना ज्यादा है। आखिर यह जिम्मेदारी किसकी है लोग कहते हैं समाज की और समाज कहता है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है। नारी का मान सम्मान भी हमारे समाज से है और नारी का शोषण भी इसी समाज से है। आंखें छलक जाती हैं बुलंदशहर जैसे दिल दहलाने वाली ताजी घटना को याद करके। सारी बातों को दरकिनार कर एक सवाल उठता है कि आखिर महिलाएं और उनके प्रति न्याय व्यवस्था कहां सुरक्षित है। किसी भी प्रकार का मामला होने पर तमाम महिला संगठन सामने आते हैं पर, शायद महिलाओं को न्याय दिलाने में कहीं ना कहीं पंगु साबित हो जाते हैं, भारत में महिलाएं हमेशा परिवार में कलंक से बचाने हेतु किए गए वध के विषय के रूप में होती हैं और उचित शिक्षा और अधिकारों से वंचित रखी जाती हैं | यह पीड़ित हैं जिन्होंने पुरुषवादी देश में हिंसा और दुर्व्यवहार को झेला है।
भारतीय सरकार के द्वारा शुरुआत की गई महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय मिशन के अनुसार 2011 की गणना में कुछ सुधार आया इससे महिला लिंगानुपात और महिला शिक्षा दोनों में बढ़ोतरी हुई। वैश्विक लिंग गैप सूचकांक के अनुसार अर्थिक भागीदारी। उच्च शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए भारत में कुछ ठोस कदम की जरूरत है, जरूरत है कि इसे आरंभिक स्थिति से निकालते हुए सही दिशा में तेज गति से आगे बढ़ाया जाए|

पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा कहा गया मशहूर वाक्य “लोगों को जगाने के लिये, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।” भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय। लैंगिक भेदभाव राष्ट्र में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अंतर ले आता है जो देश को पीछे की ओर ढ़केलता है। भारत के संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना सबसे प्रभावशाली उपाय है इस तरह की बुराईयों को मिटाने के लिये।

लैंगिक समानता को प्राथमिकता देने से पूरे भारत में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है। महिला सशक्तिकरण के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये इसे हर एक परिवार में बचपन से प्रचारित व प्रसारित करना चाहिये। ये जरुरी है कि महिलाएँ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रुप से मजबूत हो। चूंकि एक बेहतर शिक्षा की शुरुआत बचपन से घर पर हो सकती है, महिलाओं के उत्थान के लिये एक स्वस्थ परिवार की जरुरत है जो राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है। आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी की वजह से कम उम्र में विवाह और बच्चे पैदा करने का चलन है। महिलाओं को मजबूत बनाने के लिये महिलाओं के खिलाफ होने वाले दुर्व्यवहार, लैंगिक भेदभाव, सामाजिक अलगाव तथा हिंसा आदि को रोकने के लिये सरकार कई सारे कदम उठा रही है।
महिलाओं की समस्याओं का उचित समाधान करने के लिये महिला आरक्षण बिल-108वाँ संविधान संशोधन का पास होना बहुत जरुरी है ये संसद में महिलाओं की 33% हिस्सेदारी को सुनिश्चित करता है। दूसरे क्षेत्रों में भी महिलाओं को सक्रिय रुप से भागीदार बनाने के लिये कुछ प्रतिशत सीटों को आरक्षित किया गया है। सरकार को महिलाओं के वास्तविक विकास के लिये पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में जाना होगा और वहाँ की महिलाओं को सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं और उनके अधिकारों से अवगत कराना होगा जिससे उनका भविष्य बेहतर हो सके। महिला सशक्तिकरण के सपने को सच करने के लिये लड़िकयों के महत्व और उनकी शिक्षा को प्रचारित करने की जरुरत है।

उक्त बातो को ध्यान में रखते हुए ही हम सही मायनो में महिला दिवस को महिलाओं के सम्मान योग्य बना सकते हैं |

सुजीत द्विवेदी

नाईट क्लब मे बदल दिया थi राजभवन को :

यौन उत्पीड़न के आरोप लगने के बाद पद छोड़ने वाले वी षणमुगनाथन संघ के जीवनदानी प्रचारक रहे हैं यानी ऐसे प्रचारक जो जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करने का व्रत लेते हैं.

राजभवन के 80 से अधिक कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजी गई थी जिसमें उनके ख़िलाफ़ गंभीर शिकायतें की गई थीं, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया

पत्र में कहा गया था कि उन्होंने “राजभवन को ‘लेडीज़ क्लब’ में बदल दिया था जहाँ सिर्फ़ युवा महिला कर्मचारियों की ‘नाइट ड्यूटी’ लगाई जाती थी.”

मेघालय के राज्यपाल वी षणमुगनाथन ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तमिलनाडु में मज़बूत बनाने में लगाया.

परंपरागत तौर पर दक्षिण भारत में संघ की उतनी पैठ नहीं रही है जितनी उत्तर और पश्चिमी भारत में, इस लिहाज से षणमुगनाथन का काम काफ़ी कठिन था, उन्होंने 45 साल से अधिक समय संघ को गाँव-गाँव में पहुँचाने में लगाया

उन्होंने राष्ट्रवाद और हिंदू संस्कृति की महानता पर तमिल में तीन किताबें भी लिखी हैं.